आज crime petrol पर एक ऐसी स्टोरी कवर की गयी जिसे देखकर अपने को रोक नहीं पाया, इसलिए नहीं कि कोई इसे पढे और मेरी तारीफ करें पर इसलिये कि मैं इसको समय समय पर पढता रहूँ ये कहानी कही खो न जाये।

ये कहानी है सत्येन्द्र नाथ दूबे की एक IES अफसर थे, इनकी हत्या 2003 में गया, बिहार में की गई जब इनकी उम्र मात्र 30 वर्ष थी. हत्या के वक्त आप NHAI मे व्याप्त भ्रष्टाचार पर कार्यवाही कर रहे थे।हत्या की जांच CBI स्तर तक गई किन्तु वास्तविक अपराधी कभी पकड़े नहीं गए.

इस एपिसोड को देखकर मेरे मन मे एक विचार आया कि अगर आज वो जीवित होते तो 46 वर्ष के होते और ऐसी तीन परिस्थितियां होती जिसमे वो जी रहे होते –

1- वो एक बहूत ही भ्रष्ट IES अफसर होते, ऐसी स्थिति मे वो मज़े की ज़िन्दगी जी रहे होते, सभी ठेकों मे अपना कमीशन ले रहे होते, कई एकड़ के कई फ़ार्म हाउस होते.. आलीशान बंगले लक्ज़री गाडि़यों का जमवाड़ा होता. बड़े बड़े अधिकारियों, मंत्रियों व ठेकेदारों से घनिष्ठता होती और शायद रिश्तेदारी भी होती. घर वाले भी खुश रहते आगे पीछे चक्कर लगाते.कुल मिलाकर सबसे राजसी जीवन व्यतीत करते दुबे जी.

2-वे एक बीच का रास्ता अपनाते, इसमे वो अपनी एक सीमा मे रहकर कमीशन खाते, जादा गलत काम होता तो आँखे मूंद लेते पर कहते कुछ नहीं, या दिखाने के लिए कुछ कागजी कार्यवाही कर लेते.. ये रास्ता उन्हे बिना जीवन की तमाम सुख सुविधाओं के साथ साथ तनाव मुक्त जीवन भी प्रदान करवा देता.. पर उन्होने इसे भी नही अपनाया.

3-ये तीसरा रास्ता वो था जिसे उन्होने खुद चुना और जिससे शायद उनकी हत्या भी हुई. उन्होने अपने दिल की बात सुनी वही किया जो वो करना चाहते थे. एक बात मै और कहना चाहूंगा कि अच्छा काम करने की इच्छा रखने वाले लोग बहुत सारे हैं पर जान जाने का खतरा होने के बावजूद भी सही बात पर डटे रहने का जुनून पगालपन कुछ ही विरले लोगों में रहता है.

वो चाहते तो IES की नौकरी नहीं करते किसी प्राइवेट नौकरी कर रहे होते और बहुत ऊंचे ओहदे पर होते. पर उन्होने IES की नौकरी की ताकि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर मे वो अपना योगदान दे सके. जब उनका चयन NHAI के स्वर्णिम चतुर्भुज प्रोजेक्ट के लिए हुआ तो उनका खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उनका सोचना था कि ये प्रोजेक्ट हमारे देश व देश के पिछले इलाकों की दशा व चेहरा बदल जाएगा.. पर जब उनको इस बात का पता चला कि सड़को मे खराब गुणवत्ता का कार्य हो रहा है तो उन्होने इस मामले को नीचे से लेकर ऊपर तक हर जगह उठाई पर उनकी बात ना चल सकी.. पर वो भी जुनूनी थे वो अपनी बात से पीछे हटने वाले नही थे शायद इसलिए उन्हे ही रास्ते से हटा दिया गया..

आज भी जब कभी स्वर्णिम चतुर्भुज पर चलता हू तो सोचता हू की अपने देश व कर्तव्य पर दृढ़ता से चलने वाले ऐसे जुनूनी और सच्चे लोगों को लोग क्यु भूल जाते हैं और उन अधिकारियों की तरफ देखते हैं जो अलीशान मकानो मे रहते हैं बड़ी गाड़ियों से चलते हैं.नौकरी लगते ही लोग पोस्टिंग और कुर्सी के बारे मे ही सोचते हैं.

वेसे बात सही है कि अलग राह पर चलना सबके बस की बात नही है. वो लोग अलग मिट्टी के बने होते हैं. उम्मीद करते हैं कि हर घर मे ऐसी ही मिट्टी के बच्चे पैदा हो जो देश को चमकाने का प्रयास करे. मैंने ऊपर एक स्थान पर लिखा था कि वो तीन परिस्थितियां जब वो आज भी जीवित रहते, मेरे मन मे सत्येंद्र दुबेय नाम का सूरज हमेशा चमकता रहेगा अर्थात जीवित रहेंगे..

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